रविवार, 1 जनवरी 2017
इतनी भी संवेदनशीलता ठीक नहीं ! कुछ लोग बेहद संवेदनशील होते है , जरूरत से ज्यादा ! ऐसे लोग बार बार उपहास का पात्र भी बनते है . लोग ऐसे व्यक्तियो का मजाक भी उडाकर मजा लेते है। एक थे विष्णु चौरसिया (नाम परिवर्तित ) . बेहद संवेदनशील , लोग मेरे बारे में क्या कहते है , क्या सोंचते है इसके बारे में बेहद चिंतित। एक होटल थी शानदार , अच्छी चलती थी। एक बार उन्होंने अपनी होटल का रिनोवेशन(फिर से सजाना संवारना ) कराया। शहर के अच्छे पेंटर से होटल में घुसते साथ दिखने वाली दिवार पर एयर इंडिया के महाराजा की तस्वीर बनवाई स्वागत करते हुए मुद्रा में। सबको पसंद आयी खासकर ग्राहको को। यह नवीनीकरण वाकई अच्छा था। कुछ ही दिनों के बाद मैंने देखा तो पाया, उस पेंटिंग को मिटा दिया गया था , मै आश्चर्यचकित था , इतना अच्छा पेंटिंग , पैसे खर्च करके काबिल पेंटर से बनवाया , क्यों मिटवा दिया ? पता लगाया तो हमारे ही बीच में उठने बैठने वाला बाबूलाल सोनी , जो बेहद मजाकिया स्वभाव का था , एक दिन वहा गया , और बड़ा खाते हुए पेंटिंग को ध्यान से देखने लगा , जानबूझकर मुस्कुराते हुए ! यह देख विष्णु जी ने पूछ क्या देख रहे वो बाबूलाल ? तो बाबूलाल ने हंसते हुए कहा - ये पेंटिंग यह कहते हुए बनवायी है क्या कि - "आ बड़ा भजिया खा" ? एयर इंडिया का महाराजा तो यही कहते हुए लग रहा है ! बस विष्णु जी को यह बात लग गयी , दूसरे दिन , पेंटर को बुलावा कर वापस मिटवा दिया . एक बार विष्णु भैया नयी रेड शर्ट और क्रीम कलर की पेंट , जो नयी सिलवाकर पहने उए खड़े थे , कपडे के कलर और मैचिंग बेहद खिल रहा था , मैंने भी देखा तो तारीफ़ किये बगैर नहीं रहा। कुछ देर बाद मजाकिया बाबूलाल सोनी वहा से निकला , तो हंसते हुए भोला- क्या भैया "मड़ई " (मेला ) जाने की तैयारी है क्या ? बस यह तीर निशाने में लगा और विष्णु भैया तुरंत चल पड़े घर की और , शर्ट पेंट उतार कर दूसरी पहन कर वापस आ गए , उस नये कपडे को अपने बेटे को दे दिया जो उनके साइज का ही करीब करीब था। विष्णु भैया फिर कभी भी उसे नहीं पहने। पाठको , ऐसी संवेदनशीलता यदि आपमें है तो उसे सुधार ले , कभी कभी ये बहुत नुकसानदेह होता है ,ऐसे लोगो का मजाक भी दूसरे लोग उड़ाते है मनोरंजन के लिये। "दूसरे क्या सोंचते है दूसरे क्या बोलेंगे " यह जरूरत से ज्यादा सोचनेवाला घाटे में ही रहेगा। केवल लक्ष्य की तरफ एकाग्रचित्त रहना ही अच्छा होता है।
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